मेरी अनिल से मुलाकात दिल्ली के साईं मन्दिर में २६ अगस्ट १९९६ को हुई। बाबा के यह भक्त गवर्नमेंट के किसी ऑफिस में काम करते थे और जल्द ही retire होने वाले । पर अपने बेटे और बहू की बातों बहुत दुखी रहते थे और शायद येही वजह थी की उन्हें जब भी समय मिलता था वोह बाबा के मन्दिर आ जाते थे। बस उनकी एक ही तमन्ना थिस की घर के सभी लोग प्यार से एक साथ रहें ताकि वो अपनी बची ज़िन्दगी प्यार से अपने ही घर में गुजार दे।
और बाबा ने उनकी खूब सुनी , उनकी भक्ति और बाब के आशीर्वाद से आज भी उनके बेटे उनकी हर बात मानते हैं और वो सब भी बाबा के चमत्कार से सुख समृधि प्राप्त कर रहे हैं , और अनिल जी अभी भी कहीं न कहीं किसी न किसी साईं संध्या में मिल ही जाते हैं और हमेशा बाबा की जय जय कार करते रहते हैं ।
जय श्री साईं ।।
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